Labour day shayari in hindi मजदूर दिवस 2019 शायरी

Labour Day भारत में श्रमिक दिवस Indian Worker’s Day को कामकाजी आदमी और महिलाओं के सम्मान में मनाया जाता है, मजदूर दिवस Mazdoor Diwas को पहली बार भारत के मद्रास Madras वर्तमान चेन्नई Chennai में 1 May 1923 को मनाया गया, जिसका संचालन लेबर किसान पार्टी ऑफ़ हिंदूस्तान Labour Kisan Party of India ने कीया था. इस मौके पर पहली बार भारत में आज़ादी के पहले लाल झंडा का उपयोग किया गया था. इस पार्टी के लीडर सिंगारावेलु चेत्तिअर Singaravelu Chettiar ने इस दिन को मनाने के लिए 2 जगह कार्यकर्म आयोजित किये थे, पहली मीटिंग ट्रिपलीकेन बीच में व् दूसरी मद्रास हाई कोर्ट Madras Hight Court के सामने वाले बीच में आयोजित की गई थी, सिंगारावेलु ने यहाँ भारत की सरकार के सामने दरख्वास्त रखी थी कि 1 मई May को मजदूर दिवस Labour Day घोषित कर दिया जाये, साथ ही इस दिन राष्ट्रीय अवकाश National Holiday रखा जाये।

Labour and Politics of india in Hindi

मजदूर Labour सुबह से शाम तक हर जगह पर आपको मिलते रहेंगे और इनके जीवन यापन के साधनों को देख कर ही कोई व्यक्ति इनकी बदहाली को जान सकता है और समझ सकता है, उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टी के ग़ढ अमेठी के हालात देखने पर अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि कांग्रेस Congress यहां का कितना विकास कर रही थी और मौजूदा नरेंद्र मोदी Narendra Modi की सरकार जो कि बडे सपनों के आधार पर राजनीती करना जानती है, UP के Cheaf Minister of Uttar Pradesh मुख्य मंत्रि योगी Yogi Adityanath ने यहां की BJP प्रत्याशी स्म्रिती ईरानी Smriti Irani के चुनाव प्रचार में फिर से यहां पर सिर्फ राम मंदिर, भगवा आतंकवाद और राष्ट्रवाद के मुद्दों पर सवाल उठाए जिसका प्रदेश की उन्नती से कोई ताल्लुक नही है,

ग़रीब किसान, मज़दूर workers को सिर्फ अपना जीवन यापन करने के लिए दो वक्त की रोटी और शिक्षा Education तथा रहने के लिए मकान मजदूर को उसके घर के पास काम दिलवाना सबसे बडा मुद्दा है मगर इस मुद्दे पर कोई बात नही करता और मजदूर का जीवन खाना बदोश बना हुआ है जिससे ग़रीब और मजदूर के घरेलू हालात बिगडते जाते हैं और बच्चे अशिक्षा और बेरोजग़ारी के कारण ग़लत काम करने लगते हैं

Labour and Politics of india

Life of Indian Labour in Hindi

मजदूर के खानाबदोश जीवन और काम के लिए दर-दर भटकने से इसका रिश्ता हर चीज़ से जुडता जाता है मजदूर के हिस्से मे सारी दुनिया के मेहनत कशी आती है और उसकी मेहनत के कारण अमीर, कारखाना मालिक, सेढ अपनी ज़िंदग़ी खुसगवार कर लेते हैं ग़रीब मजदूर की मेहनत का हिस्सा हर जगह रहता है पर उसको किसी चीज़ पर एख्तियार नहीं इसी बात को दिलीप कुमार Dilip Kumar ने कहा, ‘इक बाग नहीं, इक खेत नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगें

भारत में राजनितिक पार्टियों ने इलेक्शन के चलते श्रमिक वर्ग या मजदूरों को अपने घोसणा पत्र में तीसरे स्थान पर रखा है इससे यही ज़ाहिर होता है की भारतीय गरीब जो कि मजदूर कामगार है, किसान आदि को इतनी वरीयता आज भी नही है सियासत में इन मजदूरों का स्थान केवल वोट बैंक बनाने के लिए किया जाता रहा है और इनको धर्म, जातिवाद के मुद्दों से बहलाकर Election के लिए Vote Bank बनाया जाता है ये मुद्दे मजदूरों, ग़रीबों मे शिक्षा के अभाव के कारण अधिक प्रभावित करते हैं मगर सच यही है कि राजनैतिक पार्टियां अपना मतलब निकालने के लिए मजदूरों और ग़रीबों का इस्तेमाल कर रहीं हैं।

International Worker’s Day 2019 मजदूर दिवस की उत्पत्ति वैश्विक स्तर पर

1 May 1986 में America के सभी मजदूर संघ Trade Union ने ये तय किया कि वे 8 घंटो से अधिक किसी भी कारखाने मे कार्य नहीं करेंगें, इसके लिए Labours सारे मज़दूर हड़ताल कर देते है. यह इस के खिलाफ था कि कारखानों और जगहों पर श्रमिक वर्ग से 10-16 घंटे काम करवाया जाता था, और सुरक्षा का भी ध्यान नहीं रखा जाता था, काम के दौरान मजदूरों को कई बार चोटें भी आ जाती थीं, इसके कारण कई मजदूरों की मौत भी हो जाया करती थी, इन्ही कारणों से ये जरुरी हो गया था, कि सभी श्रमिक वर्ग अपने अधिकारों के हनन और शोषण को रोकने के लिए सामने आयें और इन मजदूरों की खराब परिस्तिथि को सुधारने के लिए एक जुट होकर आवाज उठाएं।

Mazdoor shayari Latest Sher  collection in Hindi

यूं भूंख से ग़रीबी से मजबुर हो गये
छोडी क़लम किताब तो मजदूर हो गये
ऊंची इमारतें मेरी मेहनत का सिला हैं
बेनाम मेरे नाम से मश्हूर हो गये
जिसके लिए कमाया वो रोटी न खा सके
छाले हमारे हाथ के नासूर हो गये

आसिफ

 

कभी धागा बनाता हूं, कभी कपडा बनाता हूं
मैं हूं मजदूर जो घर के लिए ईंटा बनाता हूं
लहू मेरा पसीना बनके माथे से टपकता है
मई की धूप में जब धूप से रिश्ता बनाता हूं
यही फुटपाथ है बिस्तर मेरा मैं जिसपे सोता हूं
तुम्हारी राह के पत्थर को मैं तकीया बनाता हूं

आसिफ

 

ये धूप की गर्मी ये मेरे सर पे रखा बोझ
सारे जतन दो वक़्त की रोटी के लिए हैं
गिरवी हैं उम्र भर की कमाई तुम्हारे पास
ज़ेवर ये चन्द जो मेरी बेटी के लिए हैं

आसिफ

Labour day poem in hindi

 

आने वाले जाने वाले हर ज़माने के लिए
आदमी मज़दूर है राहें बनाने के लिए
हफीज़ जालंधरी।

अब तक मेरे आसाब पे मेहनत है मुसल्लत
अब तक मेरे कानें में मशीनों की सदा है
तनवीर शिपरा

मैं कि एक मेहनत कश मैं की तीरगी दुश्मन
सुब्हे नौ इबारत है मेरे मुस्कुराने से
मजरूह सुल्तानपूरी

फरिश्ते आ कर उनके जीस्म पर खुश्बू लगाते हैं
वो बच्चे रेल के डिब्बों में जो झाडू लगाते हैं
मुनव्वर राना

दुनिया मेरी ज़िंदगी़ के दिन कम करती जाती है क्यूं
ख़ून पसीना एक किया है ये मेरी मज़दूरी है
मनमोहन तल्ख़

सरों पे ओढ के मज़दूर धूप की चादर
खुद अपने सर पे उसे सायेबान समझने लगे
शारिब मौरानवी

लोगों ने आराम किया और छुट्टी पूरी की
यकुम मई को भी मज़दूरों ने मज़दुरी की
अफजल ख़ान

सो जाते हैं फुटपाथ पे अख्बार बिछा कर
मज़दूर कभी नींद की गोली नहीं खाते
मुनव्वर राना

तामीर-ओ-तरक्क़ी वाले हैं कहिए भी तो उनको क्या कहिए
जो शीश महल में बैठे हुए मज़दूर की बातें करते हैं
उबैदुर्रहमान

worker's day shayari Image

mazdoor Diwas shayari in hindi

पसीना मेरी मेहनत का मेरे माथे पे रौसन था
चमक लाल-ओ-जवाहर की मेरी ठोकर पे रक्खी है
नज़ीर सिद्दीक़ी

पेड के नीचे ज़रा सी छांव जो उसको मिली
सो गया मज़दूर तन पर बोरिया ओढे हुए
शारिब मौरानवी

मैने अन्वर इसलिए बांधी कलाई पर घडी
वक्त पुछेंगे कई मज़दुर भी रस्ते के बीच
अन्वर मसूद

तेरी ज़मीन पे करता रहा हूं मज़दूरी
है सूखने को पसीना मुअवज़ा है कहां
आसिम वस्ती

दौलत का फलक तोड के आलम की जबीं पर
मज़दूर की क़िस्मत के सितारे निकल आए
नुशूर वाहिद

तू क़ादिर-ओ-आदिल है मगर तेरे जहां में
हैं तल्ख़ बहोत बंदा-ए-मज़दूर के औक़ात
अल्लामा इक़्बाल

कुचल कुचल के ना फुट-पाथ को चलो इतना
यहां पे रात को मज़दूर ख़्वाब देखते हैं
अहमद सलमान

अब उनकी ख़्वाब गाहों में कोई आवाज़ मत करना
बहोत थक हार कर पुटपाथ पर मज़दूर सोए हैं
नपस अम्बालवी

बुलाते हैं हमें मेहनत कशों के हाथ के छाले
चलो मोहताज के मूंह में निवाला रख दिया जाए
रज़ा मौरानवी

बोझ उठाना शौक कहां है मजबूरी का सौदा
रहते रहते स्टेशन पर लोग कुली हो जाते हैं
मुनव्वर राना

कट चुकी है उम्र सारी जिनकी पत्थर तोडते
अब तो इन हाथों में कोहीनूर होना चाहिए
डॉ़ राहत इन्दौरी

जो देखा मां को तन्हाई में सूखी रोटियां खाते
तो बच्चे पेंक कर बस्ता कमाई पर उतर आए
वाहिद अंसारी

 

Quotes on worker’s day

dinbhar rikshaw khichte, khichte choor choor ho jate hain
Hotel ka khana khakar hum Rikhshe par so jate hai

ye dhoop ki garmi ye mere sar pe rakha bojh
sare jatan do waqt ki roti ke liye hai

 

Girwi hai umr bhar ki kamai tumhare pas
zewar ye chand jo meri beti ke liye hain

 

yun bhookh se gharibi se majboor ho gaye
chhodi qalam kitab toazdoor ho gaye

 

kabhi dhaga bnata hun, kabhi kapda bnata hun
mai hun mazdoor jo ghar ke liye inta bnata hun

 

bechne pe khudko majbuur hain ham.
itni si hai baat ki mazduur hain ham.

mehqa ke mehalon ko khud ho gaye hawa.
Shahenshao ke haath ki kafuur hain ham.

Hai zindagi amiiron ki ye jaan bhi meri.
Duniya ke banaye hue dastuur hai ham.

Padhe-likhon ke qalam ki syahi bane hue.
Jahil hi sahi lekin mash.huur hai ham.

Asim Yusufjai

Labour Day Celebration Shayari image

Labour Day Celebration Shayari

ane vaale jaane vaale har zamane ke liye

aadmi mazdur hai rahen banane ke liye
HAFEEZ JALANDHARI

ab tak mire a.asab pe mehnat hai musallat

ab tak mire kanon men mashinon ki sada hai
TANVEER SIPRA

main ki ek mehnat-kash main ki tirgi-dushman

sub.h-e-nau ibarat hai mere muskurane se
MAJROOH SULTANPURI

farishte aa kar un ke jism par ḳhushbu lagate hain

vo bachche rail ke Dibbon men jo jhadu lagate hain
MUNAWWAR RANA

duniya meri zindagi ke din kam karti jaati hai kyuun

ḳhuun pasina ek kiya hai ye meri mazduri hai
MANMOHAN TALKH

saron pe odh ke mazdur dhuup ki chadar

ḳhud apne sar pe use sa.eban samajhne lage
SHARIB MAURANWI

logon ne aram kiya aur chhutti puuri ki

yakum may ko bhi mazduron ne mazduri ki
AFZAL KHAN

so jaate haiñ fot-path pe aḳhbar bichha kar

mazdur kabhi niind ki goli nahin khate
MUNAWWAR RANA

tameer-o-taraqqi vaale hain kahiye bhi to un ko kya kahiye

jo shish-mahal men baithe hue mazdoor ki baten karte hain
OBAIDUR RAHMAN

pasina meri mehnat ka mire mathe pe raushan tha

chamak la.al-o-javahar ki miri Thokar pe rakkhi thi
NAZIR SIDDIQI

ped ke niche zara si chhanv jo us ko mili

so gaya mazdoor tan par boriya odhe hue
SHARIB MAURANWI

worker’s day Urdu Kavita

main ne ‘anvar’ is liye bandhī kala.i par ghadi

vaqt puchhenge ka.i mazdoor bhi raste ke biich
ANWAR MASOOD

tiri zamin pe karta raha huun mazduri

hai sukhne ko pasina muavza hai kahan
ASIM WASTI

daulat ka falak tod ke aalam ki jabin par

mazdoor ki qismat ke sitare nikal aa.e
NUSHUR WAHIDI

tu qadir o aadil hai magar tere jahan men

hain talḳh bahut banda-e-mazdoor ke auqat
ALLAMA IQBAL

kuchal kuchal ke na foot-paath ko chalo itna

yahan pe raat ko mazdoor ḳhvab dekhte hain
AHMAD SALMAN

ab un ki ḳhvab-gahon men koi avaz mat karna

bahut thak-haar kar fotpath par mazdur soye hain
NAFAS AMBALVI

bulate hain hamen mehnat-kashon ke haath ke chale
chalo mohtaj ke muh me niwala rakh diya jaye
Raza Maoranwi

bijh uthana shauq kahan hai majboori ka sauda hai
Rahte-Rahte station par log quli ho jate hai
Munawwar Rana

 

kat chuki hai umr sari jinki patthar todte
ab to in hathon me kohinoor hona chahiye
Dr. Rahat Indori

 

Jo dekha maan ko tanhai me sukhi rotiyan khate
to bachhe fek kar basta kamai par utar aaye
Wahid Ansari

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